Tuesday, January 31, 2017

बेतरतीब - IV

१. गुजरी वो मेरे पास से लहराती हुई फ़िज़ा सी यूँ
  फिर भी हुई मुझको भला सांस लेने में तकलीफ क्यों?


२. मैं सोचता हूँ आज से मौजूं-ए-ग़ज़ल क्या रखूं,
  Objectification के इल्जाम से आज डरा करता हूँ |
  झील सी आँखें न कहूँ मैं जुल्फ रेशमी न लिखूं,
  अब छिप के फैज़ फ़राज़ को मैं आज पढ़ा करता हूँ ||



३. ज़िन्दगी की दौड़-धूप में जहाँ जरा ठहराव है 
  वहीँ दूर से कुछ कदम पर बसता मेरा गाँव है ||


४. दर्द जब हद से बढ़ा , हम शेर में कहने लगे ।
   हमदर्दी चाही थी जरा, सब दाद ही देने लगे || 


५. कागज़ कलम, चाए गरम, संग शौक और तन्हाई भी
     पीछे के दरवाजे से फिर धूप भी अंदर आई थी 
     लफ़्ज़ों पर जो बर्फ जमी उसने तब पिघलाई थी 
    हमने लिखी गज़ल थी एक, उसने ग़ज़ल निभाई भी ।
   

Wednesday, October 19, 2016

कुश के दोहे

राम बसेंगे मंदिर जब, आएगा राम-राज |
मंदिर बनने मात्र से,  नहीं बनेंगे काज ||
(परस्पर राम-मंदिर को चुनाव पर मुद्दा बनाने पर )

ज़िन्दगी की अनिश्चितता, से लोग परेशान ||
पिन से ज्यादा सुई चुभे, जिसका पूर्वानुमान |
(जिदगी की अनिश्चितता ही उसे दिलचस्प बनाती है )

मथी जा रही ज़िन्दगी, रस्सी से दिन-रात |
एक सिरे पे ख्वाहिशें, दूजे पे औकात ||
( ज़िन्दगी तो बस ख्वाहिश और औकात के बीच की कशमकश है )

नहीं पाठशाला गये,  ना पोथी का ज्ञान  |
सुनी आत्मा की सदा, बना कबीर महान ||
(हमारी शिक्षा प्रणाली क्यों अच्छे कामगार तो दे पाती है पर अच्छे विचारक नहीं.!)

उसका पुतला फूंकते, जो कहता श्री राम |
महिसासुर के वंशधर, भुगतेंगे परिणाम ||
(JNU में विजयादशमी के अवसर में मोदी का पुतला फूंका गया)

तशरीफ़ को शरीफ जी , फिरते लेकर भाग |
पानी हिंदुस्तान का, बुझा न पाए आग ||
(सिन्धु जल संधि और surgical strike के बाद शरीफ परेशान )

"गणित" में कमजोर वही, जो जन होए उदार |
ढीले जो "इतिहास" में, मिलनसार व्यवहार || 
(इतिहास हमेशा विवादित रहा है | घटना को लेकर सबके अलग-अलग विचार होते हैं, 
इसलिए इतिहास पर बहस अक्सर कई गुट बना देती है )

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे नोट हज़ार |
चुकता न किराया कहीं, मिलता न लेनदार ||

(नोटबंदी के बाद का असर जब 500 और 1000 के पुराने नोट सरकार ने बंद कर दिए थे |)

Monday, October 3, 2016

An Open letter to Salman Khan

Deer Salman,
 .
कुछ दिन पहले आपका बयान सुना | सुन कर ख़ास आश्चर्य नहीं हुआ | आपको परदे पर डायलॉग बोलने पर तालियाँ मिलती है जिसकी वजह से अक्सर भ्रम हो जाता है कि अच्छा बोल लेते हैं और नतीजतन कभी कभी ज्यादा बोल जाते हैं | जनाब, आप लोग फ़िल्में बनाते हो जनता के मूड के अनुसार और जनता आपकी मूवी हिट करा देती है | फिर क्या! जनता की जेब जितनी ढीली होती है आपकी उतनी भारी | लेकिन हैरानगी इस बात की होती है कि ऐसे संवेदनशील विषयों पर आप जनता के मूड को वो तवज्जो नहीं देते.?!!
 .
आप कहते हो कि बॉलीवुड किसी के बाप की जागीर नहीं | बॉलीवुड हम भारतियों की जागीर है | हमारे पैसे से पला-बढ़ा है बॉलीवुड | हम नहीं चाहते कि कोई पाकिस्तानी कलाकार अमन की आशा का तमाशा बनाते हुए यहाँ पर ऐश फरमाए, हमसे कमाए और हमारी भावनाओं की कद्र भी न करे | उरी पर हमले की निंदा करने में क्या दिक्कत थी | उनकी कर्मभूमि में इतना बड़ा आतंकी हमला हुआ है, तो क्यों नहीं अपने दर्शकों के साथ खड़े दिखे.! क्यों नहीं अपनी हुकूमत के खिलाफ अपने मुल्क को आतंकवादियों की पनाहगाह बनाये जाने के विरोध में अवार्ड वापसी की | क्या ये अमन की आशा के मकसद में फ़ैल नहीं हुए?
 .
कलाकार कई हैं हमारे पास फिर हमने इन्हें फिल्मों में रोले देना क्यों शुरू किया.? इसलिए कि कला और संस्कृति का आदान-प्रदान हो | दोनों मुल्क के लोग एक दुसरे को इनके माध्यम से जानें न कि अपनी इतिहास की किताबों या जेहर उगलते लीडरों के जरिए | आज दोनों मुल्क में बच्चा-बच्चा एक दुसरे को दुश्मन मुल्क की तरह देख रहा है.! ये तो बेचारे पैसों के पीछे दौड़ते-दौड़ते अमन की आशा के उद्देश्य से ही भटक गए |
 .
आपने ये भी कहा कि कला सरहद से ऊपर है | तो इस surgical strike पर कल को जब बॉलीवुड में फिल्म बने तो फवाद खान को एक रोल ऑफर कर पता कर लीजियेगा कि कला सरहद के ऊपर है या फिर नीचे | जब बैडमिंटन एसोसिएशन से ले कर BCCI तक भारत सरकार की पाकिस्तान को अलग-थलग करने की मुहीम में उनके साथ है तो बॉलीवुड क्यों नहीं.!!
 .
कला को पनपने के लिए एक माहौल चाहिए जैसे शायर को शाम की जरुरत होती है, चित्रकार को दृश्य की जरुरत होती है .. माफ़ कीजियेगा,ये वो माहौल कतई नहीं है | जब तक हमारे जवान भी चैन से बैठ कर बॉलीवुड फ़िल्में enjoy न कर पायें , ये वो माहौल कतई नहीं हो सकता |

(I don't) Thank you, 
Shiva

Monday, April 25, 2016

Happy birthday to me.!

लखनऊ में अपनी पैदाइश हुई ..
फिर मोहल्ले भर में नुमाइश हुई |

साईकिल तक टाँगे पहुँचने लगी,
फिर फेहरिस्त बनी, फरमाइश हुई |

जब बड़े हुए, और सियाने हुए ,
फिर दिल में जवान ख्वाहिश हुई |

कॉलेज से पढ़ लिख के निकले ,
फिर खुद की शुरू आजमाइश हुई |

कुछ यादों-इरादों के साथ आज ,
“कुश” की उमर अटठाइस हुई |

...

Saturday, October 24, 2015

बेतरतीब - III

दिमाग तनिक नाराज़ है कि मैं पूरे दिन उसे खपाता हूँ ।
दिल नाराज़ है कि उसे मैं शाम नहीं दे नहीं पाता हूँ ।
ले दे के एक रात बची तब दोनों के शिकवे सुलटाता हूँ ।


शोख़ी, हया, हुस्न, अदा, नज़ाकत जैसे जालिम
इश्क के इशारे पर दिलों के कारवां लूटा किये . .

इश्क के दरिया के किनारे यूँ टहला करते हुए देखा . .
एक हुजूम डूबे जा रहा था,पर कोई भी नहीं चिल्ला रहा था !!

इश्क को बदनाम न कर हार जाने के बाद में ,
इश्क फिर शह-मात देगा, नए सर-नकाब में |

गर्म रुखसार पर उसके हथेली हमने तापी तो ,
बारिश सा छुया जैसे तो पत्तों जैसी कांपी वो . .

एक ऐसी ही शाम को, हुई पहली मुलाकात ;
यूँ जा रहा था दिन, उधर से आ रही थी रात
उस चाँद से चेहरे का नज़रों ने किया दीदार ,
पिघलने लगा दिल उधर अफ़ाक में आफताब |

तड़के ही सुबह लिहाफ से बाहर निकल आये "लफ्ज़"
कांट-छांट के "बहर" बराबर, अरसे बाद नहाये "लफ्ज़"
शायद किसी ग़ज़ल से आज कहीं मिलने का इरादा है
बन-ठन के "मीर के शेर" सा, आज बड़ा इतराये "लफ्ज़" ।