Wednesday, August 14, 2013

बेतरतीब - I

जज्बातों में तो हम बह गए . .
पर वो हैं की उस पार ही रह गए..!!

आज उठा तो दिल में एक दर्द सा  महसूस किया . .
बड़े अरसों बाद मिले थे वो आज हमसे ख्याबों में . .

यूँ गाते रहे रोज़ाना मगर एक अरसा हुआ गुनगुनाए हुए. . 
हम हंसते रहे हर दौर मे, जमाना हुआ मुस्कुराए हुए..!! .

उन नजरों ने देखा हमें पलकें उठा के . .
हम आज तलक चल रहे लड़खड़ा के . .

खुद से पलकें झुक गयी . .ओंठ कांपने लगे . .
जब आप हमारे दरमियाँ फासले नापने लगे . .
नजदीकियां जब जब हमारे नजदीकतर  होती रहीं . .
आपके इशारों को फिर हम भी जरा भांपने लगे |

तुझे देखते ही प्यार हुआ, पर इजहार न कर पाया . .
एक हादसा मेरे संग हुआ, पर अखबार न कर पाया |

छूट गयी आदत मगर बयां भी ऐसे करें .
लोग फिर कहने लगे हम यकीं कैसे करें ?

कैसे अजीब अजीब जख्म दिए,तूने मुझे ऐ बेखबर . .
के जब-जब महसूस होते हैं,हम मुस्कुराने लग जाते हैं |

11 comments:

  1. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  2. वाह ... बेहतरीन

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  3. उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के चर्चा मंच पर ।।

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  4. जेनेटिकैली सुंदर होना ही है !
    पर रविकर को भी तो शुक्रिया कह लो जी !

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    2. haha. . uncle wo to mein by default hi thankful rahunga unka hamesha :)

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  5. बेतरतीब भी बढ़िया है

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